भारत में स्थानीय स्वशासन का विकासात्मस्वरूप का अध्ययन

 

सियालाल नाग

सहायक प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान अध्ययनशाला शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय, बस्तर, जगदलपुर, छत्तीसगढ़, भारत

*Corresponding Author E-mail: siyalalnag1@gmail.com

 

ABSTRACT:

भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक राष्ट्र हैं। किसी भी प्रजातांत्रिक राष्ट्र की सफलता व सार्थकता, बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करती हैं, कि प्रभुत्व शक्ति अधिकाधिक मात्रा में जनता में निहित हो, इस प्रभुत्व शक्ति का अधिक से अधिक विस्तार हो-बिखराव हो-विकेन्द्रीकरण हो-स्थानीय स्वशासन की प्ररंपराएं निश्चित ही, इस दिशा में एक अनुकरणीय व प्रशंसनीय प्रयास हैं। यह व्यवस्था न केवल जनता व प्रतिनिधियों में लोकतांत्रिक चरित्रय का सृजन करती है। नवीन नेतृत्व को उभार कर अवसर प्रदन करती हैं, वरन् जनता व जनप्रतिनिधियों को उस योग्य भी बनाती हैं, कि वे उच्च स्तर पर लोकतांत्रिक शासन में भाग ले सकें। वास्तव में भारत प्रजातांत्रिक राष्ट्र होने के साथ ग्राम प्रधान राष्ट्र भी हैं। भारत की आत्मा गांवों में ही निवास करती हैं और गावों में स्थानीय स्वशासन की परंपराएं ही व्यवस्था का आधार हैं। इसकी परंपराएं प्राचीन समय से लेकर वर्तमान समय के दौर तक चलती आ रही है।

 

KEYWORDS: पंचायती राजव्यवस्था का विकास, विभिन्न समितियां, 73 वां संविधान संशोधन।

 

 


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भारत में स्वतंत्रता के पश्चात विकास के परिणाम स्वरूप 73वें संविधान संशोधन के पूर्व स्थानीय स्वशासन और इसकी कार्य-प्रणाली में ग्राम सभा की भूमिका नगण्य थी पर 73 वें संविधान संशोधन में ग्राम सभा को मान्यता एवं महत्व देकर भारतीय लोकतंत्र में एक नया आयाम जोडा हैं। ग्राम सभाओं का जीवंत होना केवल स्थानीय स्वशासन की राजव्यवस्था ही नही, अपितु भारतीय लोकतंत्र की सफलता में भी सहायक सिद्ध होगा। आज लोकतंत्र में जिम्मेदारी, जवाबदेही, पारदर्शिता का स्थान गौण हैं, पर स्थानीय स्वशासन व्यवस्था ने आज ग्राम सभाओं के खुले मंच पर आम आदमी की भागीदारी से जिम्मेदारी, जवाबदेही व पारदर्शिता को एक नये आयाम की ओर ले जाना शुरू कर दिया हैं ।

 

अ) प्राचीन भारत में पंचायत व्यवस्था:

भारत गाँवों का देश है। यहां कि अधिकांश जनता गाँवों में बसती हैं। 1991 के जनगणना के अनुसार 71 प्रतिशत जनता गाँवों में निवास करती हैं। यद्यापि प्राचीन काल से ही भारत नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में विभाजित था। दोंनों क्षेत्रों की प्रशासनिक व्यवस्था अलग-अलग होती थी। रामायण काल में जनपद, ग्राम का उल्लेख मिलता है। जो संभवत पंचायत के ही नाम थे। मनु संहिता में राजा और गाँव के बीच प्रत्यक्ष संबंधों की चर्चा मिलती है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र से पता चलता है, कि राज्य ग्रामीण जीवन में बहुत कम हस्तक्षेप करता था। प्राचीन समय में पंचायतों की व्यवस्था समयानुसार इस प्रकार है-

 

1. वैदिक काल में पंचायत व्यवस्था:

प्रारम्भिक आर्यो के काल में भी विकास की प्रमुख इकाई के रुप में ग्राम पंचायतें विद्यमान थी। 15000 ई़. पू. से 3500 ई. पू. तक वेदों में राज्य के विभिन्न कर्मचारियों की भूमिका के अन्तर्गत पंचायतों का उल्लेख मिलता है। उस समय राज्य में तीन अधिकारी हुआ करते थे। सबसे पहले पुरोहित, दूसरा सेनापति, एवं तीसरा अधिकारी ग्रामीण होता था। ग्रामीणी ग्राम का अधिपति एवं पंचायत का प्रमुख होता था। ग्राम ग्रामीणी सैनिक आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को स्थापित करते थे। मुख्य भूमिका का निर्वहन करता था।

 

2. बौद्धकाल में पंचायती राज व्यवस्था:

बौद्धकाल (600 ई.से 400ई.पू.) में ग्रामों की शासन व्यवस्था सुनिष्चित और सुगठित थी। संपूर्ण जनपद के शासन की इकाई ग्राम थी। ग्राम के शासन को ग्राम योजक कहते थे। ग्राम योजक के ऊपर था। वह ग्राम के अभियोगों का निर्णय करता था। मद्यपान, जुआ, पशुहिंसा जैसी दुषित प्रवृत्तियों को निषिद्ध करने का अधिकार उसको प्राप्त था।

 

मादक वस्तुओं का क्रय-विक्रय उसकी आज्ञा या अनुमति पर ही सम्भव था। किन्तु इसका अर्थ वह नही था, कि ग्रामयोजक अपने क्षेत्र में स्वेच्छाचारी शासन बन बैठता था। उसके कार्यो के विरुद्ध राजा के पास अपील की जा सकती थी। राज्यों को आवश्यकतानुसार ग्राम शासन में संशोधन करने तथा ग्राम योजक को अपदस्थ करने का अधिकार था।

 

कृषि और व्यापार पर भी ग्रामयोजक के माध्यम से विशेष ध्यान रखा जाता था। पहले समुह को ग्राम कहते थे। लेकिन इसके बाद बहुत से लोग जब एक स्थान पर बस जाते थे, तो उनकी संपूर्ण बस्ती को ग्राम या गाँव कहा जाने लगा था।

 

3. मौर्यकालीन शासन में पंचायती राज:-

चन्द्रगुप्त मौर्य (305 ई. पू. से 32 ई. पू. के महत्व) के शासन काल में स्थानीय के प्रबंधन में सुव्यवस्थित राज प्रणाली का उल्लेख तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रगुप्त के गुरु चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र नामक राजनीतिक ग्रन्थ में विवेचनात्मक शैली में किया है।

 

चन्द्रगुप्त के साम्राज्य में गाँव का शासन ग्राम सभा के द्वारा होता था। लेकिन इस समय ग्राम सभा की व्यवस्था पूर्वकालिक शासकों में सर्वथा भिन्न थी। सरकार द्वारा उसकी नियुक्ति होती थी। एवं ग्राम अधिकारी (ग्रामिक) सरकारी अधिकारी समझा जाता था। ग्रामिक की सहायता के लिए ग्राम सभा होती थी। जिसके सदस्य वयोवृद्ध गाँव वालों के द्वारा चुने जाते थे।

 

4. गुप्तकालीन शासन में पंचायती राज:-

गुप्तकालीन साम्राज्य में भी ग्राम पंचायतों का उल्लेख मिलता है। शासन की सुविधा की दृष्टि से गुप्त साम्राज्य के प्रभाव निम्नांकित थे। सबसे बडा प्रान्त, जिसको देश भक्ति कहते थे। प्रान्तीय शासन यागिक, योगपति, गोया, उपरीक महराज और स्थानीय कहलाते थे। प्रान्तों में छोटा विभाग प्रदेश और इससे छोटा विषम होता था। जो जिले के समकक्ष था। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होती थी। जिसका मुख्य अधिकारी ग्रामिक महत्तर अथवा भोजक होता था। पुण्यभूति वंश और काव्य कुंदज साम्राज्य के बारे में हर्ष चरितय में पंचायते ही शासन व्यवस्था की उत्कृष्टता का उल्लेख मिलता है।

 

ऐसा माना जाता है कि उस दौरान स्थानीय शासन में नगर शासन का अस्तित्व नहीं था। अपितु अपने संपुर्ण प्रभाव से ग्राम पंचायतें ही शासन की बागडोर संभालती थी। तत्कालीन उत्कीर्ण लेखों के अनुसार ग्राम सभा का प्रमुख ग्रामिक होता था। जो एक सरकारी अधिकारी होता था। उसके अधीनस्थ कई कर्मचारियों की व्यवस्था होती थी ।

 

5. राजपुत काल में पंचायती राज:-

राजपुत काल में ग्राम पंचायतों का महत्व छट गया। उन पर भी सामन्तों का अधिकार सत्ता छा गयी, ग्राम शासन में दक्षिण भारत जितना संगठित था। उतना उत्तर भारत नहीं था। राज्य के विशाल होने पर तत्कालीन शासन प्रान्तों, जिलों अधिष्ठानों और ग्रामों में विभक्त होता था। इस वृद्धि से शासन पद्धति के आधार पर ही थी। परन्तु शासन के विकेन्द्रीकरण की भावना पर आधारित होने के कारण केन्द्रीय शक्ति को सदैव खतरा बना रहता था।

 

6. ब्रिटिश काल में पंचायती राज:-

ब्रिटिश शासन काल में भारत की प्राचीन सुदृढ़ शासन प्रणाली से तहस नहस करने में सर्वप्रथम पंचायत व्यवस्था को चुना गया, परन्तु यह सुदृढ़ शासन प्रणाली टुटी नही और उसका स्वरुप बिरादरी ने ले लिया। लेकिन बाद में विकास के मूल अंग्रेजों ने पंचायत के महत्व को समझा और सन् 1250 ई. ये सभी प्र्रांतों से ग्राम पंचायत अधिनियम पारितकर उसे अत्यल्प अधिकारी के साथ क्रियान्वित किया गया। अंग्रेजी शासन प्रणाली में पंचो का जनता द्वारा चुनाव न होकर वे सरकार द्वारा मनोनीत किये जाते थे। चूंकि पंचायती राज की स्थापना के मूल में अंग्रेजों का लक्ष्य कुछ भी रहा हो पर वे इसे शासन का सुदृढ़ संगठन अवश्य मानते थे। इसी तथ्य की वास्तविकता को सिद्ध करने के लिए सन् 1907-08 ई. में ब्रिटिश सरकार द्वारा विकेन्द्रीकरण के लिए गठित रायल समिति की सन् 1909 में पेष रिपोर्ट निम्न सुझाव थे-

1. पंचायतों को छोटे स्तर के सिविल तथा फौजदारी मुददों पर स्वयं हल करना चाहिए।

2. चयनित पंचायतों को ईधन एवं लकड़ी के साधनों पर अपना नियंत्रण रखना चाहिए।

3. ग्राम पंचायत का सफाई व्यवस्था निर्माण व्यवस्था का भार सौंप देना चाहिए ।

 

ब.) मध्यकाल में पंचायती राज -

मध्यकाल के (1200-1526) सल्तनत काल के दैारान भी सबसे छोटी शासकीय इकाई गाँव थी। इसमें ग्राम पंचायतों का प्रशासनिक स्तर अत्यंत उत्कृष्ट था। ग्राम पुरी तरह से स्वतंत्र थे, मुगलकाल (1526-1706) में भी गाँव ही प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी। आइने अकबरी के अनुसार परगनों को गाँवों में विभाजित कर रखा। पंचायतों द्वारा गाँवों का प्रबंध होता था। ग्राम में चार महत्वपूर्ण अधिकारी थे। मुकदूम, पटवारी, चौधरी और चौकीदार। इनमें गाँव की देखभाल का कार्य मुकदूम करता था। लगान वसुली का कार्य पटवारी करता था। पंचायतों की सहायता से चौधरी झगड़ों को सुलझाता था। और सुरक्षा के लिये प्रत्येक गाँव में एक चौकीदार होता था।

 

स) आधुनिक काल में पंचायती राज शासन प्रणाली -

भारतीय नेताओं द्वारा 1885 में कांग्रेस के गठन से ही भारत में पंचायती राज शासन की मांग ब्रिटिश सरकार से किया जाता रहा। ग्रामीण पंचायतों को पुनः जीवित करने की मांग सर्वप्रथम 1909 में की गयी। सन् 1909 में कांग्रेस दल ने लाहौर में आयोजित अपने 24 वें अधिवेशन में रखा गया। इसके बाद सन् 1913 में लाहौर में 28 वें कांग्रेस अधिवेशन में कांगेस को पुनः ग्राम पंचायत के गठन की मांग की। सन् 1915 में गांधी जी के दक्षिण अफ्रीक से लौटने के बाद पुरे देश में स्वदेशी का लहर दौड़ गयी। तब 14 फरवरी 1916 को मद्रस मिशनरी सम्मेलन में गांधी जी ने सर्वप्रथम ग्राम पंचायत का मांग उठाया। उन्होंने एक ऐसी संस्था के गठन की मांग की जिसके माध्यम से जनता स्वयं अपने शासन को संचालित कर सकें।

 

स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद पंचायती राज प्रणाली को प्रांरम्भ करने हे तु सामुदायिक विकास कार्यक्रम को अपनाया गया। इसके लिए केन्द्र में पंचायती राज में सामुदायिक विकास मंत्रालय की स्थापना की गयी और श्री. एस.के.डे. को इस विभाग का मंत्री बनाया गया। प्रो. रजनी कोठारी के अनुसार “राष्ट्रीय नेतृत्व का एक दूरदर्शिता पूर्ण कार्य था। पंचायती राज की स्थापना” इससे भारतीय राज व्यवस्था का विकेन्द्रीकरण हो रहा है और देश में एक सी स्थानीय संस्था के निर्माण से उसकी एकता भी बढ़ रही है। पंचायती राज शासन प्रणाली को अधिकार सौंपना चाहिए। उसको काम करने दो, चाहे वे हजारो गलतियाँ करे। इससे घबराने की जरुरत नहीं पंचायतों को अधिकार दो।

 

बलवंतराय मेहता समिति प्रतिवेदन-

समुदायिक विकास कार्यक्रम पर काफी खर्च हो चुके और इसकी सफलता के लम्बे चौडे़ दावों के बाद इसकी जांच के लिए एक अध्ययन दल 1957 में नियुक्ति किया गया। इस अध्ययन दल के अध्यक्ष श्री बलवंतराय मेहता थे। अध्ययन दल को सौंपे गए कार्यो में एक कार्य जिसका कि दल को अध्ययन करना था। यह था, कि कार्य सम्पदन में अधिक तीव्रता लाने के उद्देश्य से कार्यक्रम का संगठनात्मक ढ़ांचा तथा कार्य करने के तरीके कहां तक उपयुक्त थे। इस दल ने सरकार को बताया की सामुदायिक विकास कार्यक्रम की बुनयादी त्रुटि यह है, कि जनता का इसमें सहयोग नही मिला अध्ययन दल ने सुझाव दिया कि एक कार्यक्रम को जिसका कि लोगो के दिन-प्रतिदिन के जीवन से सम्बंध हैं, केवल उन लोगो के द्वारा ही कार्यान्वित किया जा सकता है। ‘मेहता अध्ययन दल‘ ने 1957 के अंत में अपनी रिपोर्ट में यह सिफारिश की कि लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण और सामुदायिक विकास कार्यक्रमों को सफल बनाने हेतु पंचायती राज संस्थाओं को तुरन्त शुरुआत की जानी चाहिए। अध्ययन दल ने इसे ‘लोकतंत्रीय विकेन्द्रीकरण‘ का नाम दिया।

 

इस प्रकार लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण और विकास कार्यक्रमों में जनता का सहयोग लेने के ध्येय से पंचायती राज की शुरुआत की गयी। इनके स्वरुप में विभिन्न राज्यों में कुछ अन्तर था। मगर कतिपय विशेषताएँ एक सी थी। एक तो पंचायती राज की तीन सीढ़िया थी। ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद। दूसरा पंचायती राज प्रणाली में स्थानीय लोगो को काम करने की आजादी थी और देख रेख ऊपर से होती थी। तीसरा, सामुदायिक विकास कार्यक्रम की भांति यह शासकीय ढांचे का अंग नहीं था। पंचायती राज की संस्थाएँ निर्वाचित होती थी और इसके कर्मचारी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अधीन काम करते थे। चुतुर्थ, साधन जुटाने और जन सहयोग संगठित करने का भी इन संस्थाओं को प्रर्याप्त अधिकार था।

 

अशोक मेहता माँडलः-  जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद 12 सितंबर 1977 को मंत्रिमण्डल सचिवालय ने पंचायती राज संस्थाओं की कार्यप्रणाली का अध्ययन करने एवं प्रचलित ढांचेत में आवश्यक परिर्वतन सुझाव हेतु एक उच्चस्तरीय समिति नियुक्त की। श्री अशोक मेहता इस समिति के अध्यक्ष थे। इस समिति ने अपने प्रतिवेदन में पंचायती राज संस्थाओ का एक नया प्रतिमान (माँडल) सुझाया था। समिति के सिफारिश के पीछे मूल भावना यह थी कि सत्ता का विकेन्द्रीकरण कर उसे संस्थागत रुप प्रदान किया जाए। समिति द्वारा सुझाव पंचायती राज प्रतिमान (माँडल) की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार है। प्रथम, जिला परिषद को मजबूत बनाया जाए तथा ग्राम पंचायत की जगह मण्डल पंचायत की स्थापना की जाए। अर्थात पंचायती राज संस्थाओं के संगठन के दो स्तर-जिला परिषद तथा मण्डल पंचायत हो। द्वितीय, जिले को विकेन्द्रीकरण की धुरी माना जाए तथा जिला परिषद को समस्त विकास कार्यो का केन्द्रबिन्दु बनाया जाए। जिला परिषद ही जिले का आर्थिक नियोजन कार्य करेंगी, समस्त विकास कार्यो में सामंजस्य स्थापित करेंगी। तृतीय, जिला परिषद के बाद मण्डल पंचायतों को विकास कार्यक्रम का आधारभूत संगठन बनाया जाना चाहिए। मण्डल पंचायतों का गठन कई गाँवों से मिलकर होगा। ये मण्डल पंचायतें 15,000-20,000 की जनसंख्या पर गठित की जाएगी। मण्डल पंचायतो को कायक्रम क्रियान्वयन की दृष्टि से धरातलीय संगठन के रुप में विकसित किया जाए। धीरे धीरे पंचायत समितियां समाप्त हो जाएगी और उनका स्थान मण्डल पंचायतें ले लेगी। चतुर्थ, पंचायती राज संस्थाएँ समिति प्रणाली के आधार पर अपने कार्यो का सम्पादन करें। पंचम, जिला कलेक्टर सहित जिला स्तर के सभी अधिकारी अंततः जिला परिषद के मातहत रखें जाएं। षट, इन संस्थाओं के निर्वाचनो में राजनीतिक दलों को खुले तौर से अपने चुनाव चिन्हों के आधार पर भाग लेने की स्वीकृति दी जाए सप्तम, न्याय पंचायतों को विकास पंचायतों के साथ नहीं मिलाया जाना चाहिए। यादि न्याय पंचायत की अध्यक्षता योग्य न्यायधीष करें और निर्वाचित न्याय पंचायतों को उनके साथ सम्बंध कर दिया जाए तो अधिक अच्छा होगा।

 

डॉ. जी.वी.के. राव समितिः- 1985 में डॉ.जी.वी.के. राव समिति को गठित करके उसे ग्रामीण विकास तथा गरीबी के लिए प्रशासनिक व्यवस्था पर विचार करने का कार्य सौंपा गया। समिति ने चार सोपान वाली प्रणाली की सिफारिश की थी। जिसमें राज्य विकास परिषद, जिला परिषद, पंचायत समिति, मण्डल पंचायत तथा ग्राम सभा होगी। लेकिन इस समिति की सिफारिशों को भी लागू नही किया गया।

 

डॉ. एल. एम. सिधंवी समितिः- 1987 में डॉ.एल.एम. सिधंवी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन हुआ, जिसे पंचायती राज संस्थाओं के कार्यो की समीक्षा करने तथा उसके सुधार करने के संबंध थे। इस समिति ने ग्राम पंचायत को अधिक जीवन ओर सक्षम बनाने के लिए गाँवों के पुर्नगठन की सिफारिश की तथा इन संस्थाओं को अधिक वित्तिय संसाधन सुलभ कराने का सुझाव दिया ।

 

पी.के.थुंगन समिति:- 1988 में पी.के.थुगन की अध्यक्षता में कार्मिक लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति की एक उप-समिति का गठन किया गया। इस समिति को यह विचार करने का दायित्व सौंपा गया कि जिला स्तर की आयोजन के लिए जिले में किस प्रकार की राजनीति और प्रशासनिक संरचना की स्थापना की जाए। समिति ने यह सुझाव दिया कि पंचायती राज का संवैधानिक व्यवस्था की जानी चाहिए तथा इनका कार्यकाल पांच वर्ष होना चाहिए। इस समिति का मत था। कि जिला परिषदों को केवल योजना और विकास से संबंधित होना चाहिए।

 

पंचायती राज उतार चढाव:

भारतीय संघ के अधिकांश राज्यों ने पंचायती राज संस्थाओं के गठन के लिए अधिनियम पारित किये। राजस्थान सबसे पहला राज्य था। जिसने अपने यहां पंचायती राज की स्थापना की। इस योजना का उद्घाटन 2 अक्टूबर 1959 को प्रधानमंत्री नेहरु द्वारा नागौर में किया गया। 1959 में ही आंध्र प्रदेश भी पंचायती राज व्यवस्था को अपने प्रान्त में लागू कर राजस्थान के साथ पहले नम्बर पर आ गया। पंचायती राज संस्थाओं की संरचना विभिन्न राज्यों में अलग अलग रही। देश के 14 राज्यो/संघ शासित क्षेत्रों में एक स्तरीय प्रणाली थी।

 

प्रारम्भ से ही माना गया कि पंचायती राज संस्थाएँ ठीक प्रकार से कार्य नही कर रही हैं, भले ही 1959 से 1964 तक के इनके कार्यकाल को उत्थान काल कहा जाये तथापि 1965 से 1969 की कार्यवधि को ठहराव काल एवं 1969 से 1983 तक की कार्यवधि को ह्नास काल कहा जाता हैं। लम्बे समय तक विभिन्न राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव तक नहीं करवाये गयें और ये संस्थाएँ निष्क्रिय हो गयी। वैसे 1977 में अशोक मेहता समिति रिर्पोट में इन संस्थाओं को नया रुप देने हेतु सिफारिश की गई, किन्तु उन्हें क्रियान्वित नही किया जा सका, वस्तुतः 1983के बाद पंचायती राज संस्थाओं के जीवनकाल में पुनरोदय प्रारम्भ होता है। इस दिषा में 1985के कर्नाटक जिला परिषद, तालुका पंचायत समिति, मंडल पंचायत एवं न्याय पंचायत अधिनियम की महती भूमिका रही है। 1985 में डॉ.जी.वी. के. राव की अध्यक्षता में नियुक्त समिति ने नीति नियोजन और कार्यक्रम क्रियान्वयन के लिए जिले को आधार बनाने और पंचायती राज संस्थाओं में नियमित चुनाव कराने की सिफारिश की 1987 में पंचायती राज संस्थाओं की समीक्षा और उनमें सुधार के उपायो हेतु सुझाव देने के लिए डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी की अध्यक्षता में नियुक्त समिति ने ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हे अधिक आर्थिक संसाधन प्रदान करने की सिफारिष की थी।

 

पंचायती राज का नया प्रतिमानः 73वां संविधान संशोधन:

संविधान के 73 वें संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को सांविधानिक मान्यता प्रदान की गई है। संविधान में नया अध्याय 9 जोड़ा गया, अध्याय 9 द्वारा संविधान में 16 अनुच्छेद और एक अनुसूचि में वृद्धिकर -11वी अनुसूचि जोड़ी गयी है। 25 अप्रैल 1993 से 73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1993 लागू किया गया है।

 

इसी के आधार पर वर्तमान भारत में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था चल रही है। जो कि निम्नलिखित इस प्रकार है।

(1) ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत:- प्रत्येक ग्राम पंचायत में न्यूनतम 10 वार्ड होगे तथा पंचायत की जनसंख्या 1000 से अधिक होगी। प्रत्येक वार्ड की संख्या 20 से अधिक नही होगी। प्रत्येक वार्ड से एक पंच का चुनाव किया जायेगा। ग्राम पंचायत के गठन से सम्बंधित प्रवाधान अधिनियम के अनुछेच्द 12 में किया गया है।

 

(2) विकासखण्ड स्तर पर जनपद पंचायत:- प्रत्येक जनपद पंचायत को जनसंख्या के आधार पर अधिकतम 25 निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है। प्रत्येक क्षेत्र की जनसंख्या 5,000से अधिक तथा 50,000से कम होनी चाहिए।

 

(3) जिला स्तर पर जिला पंचायत:- जिला पंचायत के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का विभाजन राज्य सरकार की अधिसूचना द्वारा जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या 50,000से कम तथा 5,00,000 से अधिक न हो जिले को न्यूनतम 10 तथा अधिकतम 35 निर्वाचन क्षेत्रों (वार्डो) में विभक्त किया जायेगा।

 

पंचायती राज की उपलब्धियां एवं समस्याएं:

हमारे देश में पंचायती राज की शुरुआत को एक ऐतिहासिक घटना कहा गया है। पंचायती राज संस्थाओं से अधिक प्रशंसा बहुत ही कम संस्थाओं को प्राप्त हुई है। पं. नेहरु ने स्वयं कहा था कि “मैं पंचायती राज के प्रति पूर्णतः आशान्वित हूँ। मैं महसूस करता हूँ कि भारत के सन्दर्भ में यह बहुत कुछ मौलिक एवं क्रांतिकारी है।” प्रो.रजनी कोठारी  के अनुसार “इन संस्थाओं ने नए स्थानीय नेताओं को जन्म दिया है। जो आगे चलकर राज्य और केन्द्रीय सभाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियों से अधीक शक्तिशाली हो सकते है। कांग्रेस और अन्य दलों के राजनीतिज्ञ इन संस्थाओं को समझने लगे हैं। अब वे राज्य-विधानमण्डल के बजाय पंचायत समिति और जिला परिषदों को तरजीह देने लगे है। ”वस्तुतः इन संस्थाओ ने देश के राजनीतिक, आधुनिकीकरण और समाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है तथा हमारी राजनीतिक व्यवस्था में जन हिस्सेदारी में वृद्धि करके गाँवों में जागरुकता उत्पन्न कर दी है। फिर भी यह तो कहना ही पडेगा कि पिछले लगभग 40 वर्षो का अनुभव विशेष उत्साहवर्द्धक नही रहा। ये संस्थाएँ ग्रामीण जनता में नयी आशा और विश्वास पैदा करने में असफल रही है। वस्तुतः जब तक ग्रामीण जनता में चेतना नही आती, तब तक ये संस्थाए सफल नही हो सकती, किन्तु इसका यह तात्पर्य कदापि नही कि पंचायती राज-व्यवस्था असफल हो गयी है। कुछ राज्यो में तथा कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में इन संस्थाओं ने सराहनीय कार्य किया है। यह कार्य मुख्यतः नागरिक सुविधाओं के ही सम्बन्ध में हुआ है। पंचायती राज संस्थाओं के समक्ष कुछ नयी समस्याएं उत्पन्न हो गयी है, कुछ पहले ही थी, जिनका निराकरण करना आवश्यक है। ये समस्याएं।

 

(1) सत्ता के विकेन्द्रीकरण की समस्या:- लोकतांत्रिक विकेन्दीकरण की सफलता की पहली शर्त सत्ता का स्थानीय संस्थाओं के हस्तान्तरण करना है। पंचायती राज संस्थाओं को स्वायत्त शासन की शक्तिशाली ईकाइयां बनाना था। यह तबी सम्भव है। जब प्ररेणा नीचे के स्तर से शुरू हो और उच्च स्तर केवल मार्ग निर्देशन करे। राज्य सरकारे इन संस्थाओं को अपने आदेशों का पालन करने वाला एजेण्ट मात्र न समझे, इसके लिए नौकरशाही की मनोवृत्ति में परिवर्तन की आवश्यकता है।

 

(2) अशिक्षा एवं निर्धनता की समस्या:- अशिक्षा और ग्रामीणों की निर्धनता की विकट समस्या है। इसके कारण ग्रामीण नेतृत्व का विकास नही हो रहा है ओैर वे अपने संकीर्ण दायरों से ऊपर नही उठ पाते है, किन्तु वर्तमान में शिक्षा की दिशा में शासन द्वारा किए गए कार्यो से हमारे उत्साह में वृद्धि हो रही है।

 

(3) दलगत राजनीति :- पंचायती राज की सफलता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा दलगत राजनीति है। पंचायतें राजनीति का अखाडा बनती जा रही है। पंचायतों में छोटी-छोटी बातों को लेकर झगडे हुआ करते है, दलबन्दी होती है और बहुत सा समय लड़ने-झगड़ने में निकल जाता है। यदि हमारे राजनीतिक दल पंचायतों के चुनावों में हस्तक्षेप करना बंद कर दें, तो पंचायतों को गन्दी राजनीति के दलदल से निकाला जा सकता है।

 

(4) धन की समस्या:- धन की समस्या पंचायती राज संस्थाओं के सामने शुरू से ही रही है। इन संस्थाओं को स्वतंत्र आर्थिक स्रोत या तो दिए ही नही गए या फिर जो भी दिए गए वे अर्थशून्य है। परिणामतः शासकीय अनुदानो पर ही जीवित रहना पड़ता है। अतः आय के प्रर्याप्त एवं स्वतंत्र स्रोंत पंचायती संस्थाओं को दिए जाने चाहिए, ताकि उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ बन सकें।

 

इनके अतिरिक्त और भी कई समस्याएं है। राजनीतिक जागरुकता की कमी, विकास कार्यो की उपेक्षा, षासकीय अधिकारियों एवं निर्वाचित प्रतिनिधियों में सहयोग का अभाव आदि।

 

पंचायती राज की सफलता के लिए सुझाव:

भारत के लिए गांव आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है और गाँवों का सर्वागीण विकास पंचायतों की सफलता के द्वारा ही सम्भव है। पंचायतों की सफलता के लिए निम्नांकित सुझाव दिए जा सकते है-

(1) पंचायती राज संस्थाओं में व्याप्त गुटबन्धी को समाप्त करना होगा।

(2) पंचायतों के चुनावों में मतदान को अनिवार्य करना होगा और जो मतदाता चुनाव में भाग न ले उस पर कुछ दण्ड लगाया जाए, जो पचास रुपयो से अधिक न हो   ।

(3) पंचायतों की वित्तीय हालत सुधारनी होगी ।

(4) अधिकारियों को पंचायतों के मित्र, दार्शनिक और पथ-प्रदर्शक रुप में कार्य करना चाहिए।

(5) पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और अंत में पंचायतों पर विश्वास करना होगा, वे गलतियां करेगी और हमारा दृष्टिकोण गलतियां करेंगी और हमारा दृष्टिकोण उनके प्रति उदार ही अपेक्षित है।

 

निष्कर्षः-

भारत में स्थानीय स्वशासन की परंपरा न केवल प्राचीन है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा भी है। 73वें संशोधन ने इसे संवैधानिक बल प्रदान किया, लेकिन इसके क्रियान्वयन में अभी भी अनेक चुनौतियॉ हैं। यदि पंचायतों को सषक्त, स्वतंत्र और उत्तरदायी बनाया जाए, तो यह लोकतंत्र की असली भावना को धरातल पर उतार सकती है।

 

संदर्भ सूची:-

1.    बाजापेयी, अशोक - ‘‘ग्राम विकास एवं पंचायती राज पंचायज, राज एड रूरल डेवलपमेंट, संहिता प्रकाशन, नई दिल्ली, 1997।

2.    द्विवेदी, डॉ. राधेश्याम - म. प्र. पंचायती राज अधिनियम, 1993।

3.    जैन - प्रतिभा - ‘‘गांधी का ग्राम स्वराज्य एवं पंचायती राज, निर्देशक, गांधी अध्ययन केन्द्र, जोधपुर, राजस्थान पत्रिका।

4.    जैन, डॉ. पुखराज एवं डॉ. फड़िया बी.एल. - ‘‘भारतीय शासन एवं राजनीति, साहित्य भवन पब्लिकेशन्स, आगरा, 2003।

5.    कोठारी, रजनी, ‘‘पॉलिटिक्स इन इंडया,, ओरियंट लांग मैन नई दिल्ली, 1970।

6.    कोठारी, डॉ. रजनी, - ‘‘भारत में दलीय व्यवस्था और संसदीय लोकतंत्र,, अर्जुन पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली ।

7.    नेहरू जवाहरलाल- ‘‘सामुदायिक विकास व पंचायती राज,, 1965 सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, दिल्ली

8.    माहेश्वरी, एस.आर., - ‘‘भारत में स्थानीय शासन,, प्रकाशन लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, आगरा, 1984।

9.    प्रसाद विष्णु, ‘‘भारत में स्थानीय स्वायत्तता शासन प्रणाली,, 1983।

10.  रघुकुल तिलक - ‘‘लोकतंत्र स्वरूप एवं समस्याएं‘‘।

11.  सिंह, आर. एल, - ‘‘लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण,,  लोक प्रशासन, 1977 रतन प्रशासन, आगरा।

12.  सुरौलिया- विनोद, -‘‘पंचायती राज जनता की सहभागीता‘‘ उत्तर प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी,1995।

13.  शर्मा, हरिश्चन्द्र, ‘‘भारत में स्थानीय शासन का इतिहास,, कालेज बुक डिपो, 1997।

14.  सुरौलिया - शंकर, ‘‘प्राचीन भारत में ग्रामीण शासन,, कालेज बुक डिपो, 1975।

15.  शर्मा, विद्यासागर, - ‘‘पंचायती राज भारत में पंचायती प्रणाली के महत्व, इतिहास और वर्तमान स्वरूप का विवेचन‘‘ हिन्दुस्तान एकेडमी में, उत्तरप्रदेष, इलाहाबाद, 1963 ।

16.  शर्मा डॉ. अरविद - छत्तीसगढ़ का राजनीतिक इतिहास, अरपा पाकेट बुक्स, बिलासपुर, अगस्त 1999।

17.  श्रीवास्तव, डॉ.एन .के., भारत में पंचायती राज, निधि प्रकाशन, ग्वालियर।

18.  तिवारी, चौधरी एवं चौधरी,- ‘‘भारत में पंचायती राज,, ,राजस्थान में पंचायती राज, ऋचा प्रकाशन, 1994।

19.  उपाध्याय, विश्वामित्र, ‘‘ग्राम पंचायतों को नवजीवन देने का समय,, ,कुरूक्षेत्र दीवान पब्लिकेशन्स, 1993।

 

पत्र एवं पत्रिकाएँ:-

1.    अनुसूचित क्षेत्रो हेतु महत्वपुर्ण संहिता/अधिनियमो में संशोधन पंचायत उपबंध अधिनियम 1996 के तहत अनुसूचित जनजातियों एवं क्षेत्रों के लिये भूरिया समिति की अनुशंसाओं पर आधारित, आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति कल्याण विभाग, मध्य प्रदेश ।

2.    भारत का राजपत्र, विधि और न्याय मंत्रालय, अधिसूचना, नई दिल्ली, 20 फरवरी 2003। 

3.    म.प्र में नया पंचायती राज - म.प्र. शासन पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, जुलाई 19994 ।

4.    गाँवों के विकास के लिए ग्राम पंचायत के कर्तव्य उत्तरदायित्व और अधिकार - म.प्र. शासन पंचायत एवं ग्रामीण विकास, जुलाई 1994।

5.    पंत नवीन, ‘‘ग्राम विकास में महिलाओं की भूमिका,, ‘‘कुरूक्षेत्र,, सितंबर 1994, नई दिल्ली ।

 

 

Received on 25.10.2025      Revised on 10.12.2025

Accepted on 15.01.2026      Published on 17.03.2026

Available online from March 20, 2026

Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(1):49-55.

DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00012

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